06 May 2009

वास्तु परिचय

निवास करने का स्थान जो हवा, वर्षा, सर्दी, गर्मी और हिंसक पशु आदि अन्य चीजो से रक्षा कर सकता हो वह “वास्तु१” कहलाता है। निवास का वह स्थान या भवन जो हवा और बारिश से रक्षा न कर सके, वास्तु के नियम उस पर लागू नहीं होते।

खिड़की, दीवार, खंभे, छत और दरवाजे ही वास्तु नहीं। पूरा घर, घर के लोग और इन दोनो का एक-दूसरे से तालमेल ही अनुकूल वास्तु बना सकता है। इससे घर को ऊर्जा मिलती है और फिर घर हमें ऊर्जा देता है।

अकसर, वास्तुविद् अपने क्षेत्र की पुस्तक और धर्म-ग्रंथों के उदाहरणों को आधार मान कर हर किसी को वास्तु सलाह दे देते हैं। फिर चाहे वो यजमान/जातक/सवाली हिन्दुस्तान या दुनिया के किसी भी कोने या धर्म का क्यों न हो। थोड़ा सोचिए, आधी दुनिया में सूर्य हर दिन दक्षिण और आधी दुनिया में उत्तर से होकर गुजरता है। जो दक्षिणी गोलार्ध (आस्ट्रेलिया, न्यू-जीलॆण्ड, ब्राज़ील ) में रहते हैं क्या उनके लिए भी कर्म, यश, पद आदि का स्थान कुण्डली में 10वाँ ही रहेगा? क्या उनका भवन भी नैर्ऋत्य कोण में ऊँचा होना चाहिए? हमारे साहित्य में छांव को अच्छा मगर पश्चिमी देशों के साहित्य में बुरा माना जाता है।

ज्योतिष में देश-काल-पात्र के विचार को हमेशा बहुत महत्व दिया जाता है। हालांकि इसका विचार हर क्षेत्र में होना चाहिए। लेकिन वास्तु-शास्त्र का बड़े-से-बड़ा विद्वान भी वास्तु-विचार में देश, काल और पात्र के विचार या तो नहीं करता या न के बराबर महत्त्व देता है।

इसके आलावा, जो नियम गृह-वास्तु का है उसे हम नगर-वास्तु या देश के वास्तु पर लागू नहीं कर सकते। चलिये अपने देश को ही देखिये- उत्तर-ईशान में ऊँचा और दक्षिण-नैर्ऋत्य में नीचा। जोकि वास्तु-नियम के विपरीत है, लेकिन वास्तव में ये हमारे लिए अनुकूल है। मैं अनेक वर्षों से यूरोप के विभिन्न देशो में ज्योतिष, समुद्र और वास्तु विद्या पर काम कर रहा हूँ। मैंने इसमें पाया कि भारतीय वास्तु-शास्त्री इन यूरोपीय लोगो को भारतीय मौसम के अनुकूल भवन बनाने की सलाह देते हैं। उत्तर-ईशान-पूर्व में खुला और दक्षिण-नैर्ऋत्य-पश्चिम में बंद वगैरह वगैरह।

एक बात मैंने और देखी अपने विद्वानों की कि फैंग-शूई का वास्तु में धड़ल्ले से प्रयोग करते हैं। दो विद्याओं की आपस में खिचड़ी नहीं पकानी चाहिए। हालांकि फैंग-शूई के शार (वेध) वाले नियम मैं भी अपनाता हूँ, क्योकि भारतीय वास्तु शास्त्र में भी वेध का विचार बहुत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन ग्रंथो में शार के बारे में इतना विस्तार से नहीं बताया गया है।
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१भगवान् शंकर जब एक राक्षस का वध कर रहे थे, उस समय शंकरजी के पसीने की बून्द से एक प्राणी का जन्म हुआ। इस कारण वह प्राणी बहुत उग्र और विकराल था। एक बार जब वह पृथ्वी पर अधोमुख होकर गिरा, उसी समय देवता उसके ऊपर जा बैठे और उसे स्तंभित कर दिया। जो देवता उस प्राणी के जिस अंग पर बैठा वहीं निवास करने लगा। देवताओं के निवास के कारण उस प्राणी को “वास्तु” या “वास्तु-पुरुष” कहा गया।

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