15 August 2008

॥श्री गणेशाय नमः॥

(यहां पेज लो़ड करने में मुझे कुछ दिक्कतें आ रहीं है।... इस ब्लॉग के सारे पन्ने आप http://way2wisdom.wordpress.com/ पर पढ़ सकते हैं।)

मैं सबसे पहले श्री गणेश जी का स्मरण करते हुए इस ब्लॉग का शुभारम्भ तथा आपका स्वागत करता हूँ। श्री गणेशजी के ही एक अन्य रूप को मैं अपना इष्टदेव मानता हूँ, सो इसलिए उन्हें ऐसे समय पर प्रणाम करना और भी जरूरी है। और इस ब्लोग का विषय भी कुछ ऐसा है कि इनकी सहयता के बिना एक कदम भी नहीं चला जा सकता। ऐसे समय में इनके भाई को भी याद करना जरूरी है क्योंकि प्रज्ञा-पथ को वो सुगम-सुलभ करने में माहिर हैं। हमारे उत्तर भारत में गणेश जी के भाई कार्तिकेय जी (सुब्रामण्यम) की लोकप्रियता कुछ कम जरूर हैं लेकिन उनके प्रति हमारी श्रद्धा दक्षिण भारत वालों से कम नहीं है।
तो सबसे पहले गणेश जी (क्योंकि इस स्थान पर उनका अधिकार है) का स्तोत्र श्री सङ्कष्टनाशन गणेश स्तोत्र और फिर किर्तिकेय जी का श्री प्रज्ञा विवर्धनाख्यं कार्तिकेय स्तोत्र पढ़कर दोनों भाईयों का आशीर्वाद लें।


॥श्री गणेशाय नमः॥
श्री सङ्कष्टनाशन गणेश स्तोत्रम्
नारद उवाच।
प्रणम्य शिरसा देवं गौरी पुत्रं विनायाकम्।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यम् आयुष्कामार्थसिद्धये॥१॥
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम्।
तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतर्थकम्॥२॥
लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम्॥३॥
नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम्।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम्॥४॥
द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं परम्॥५॥
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम्॥६॥
जपेद्गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत्।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः॥७॥
अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत्।
तस्य विद्या भवेत् सर्वा गणेशस्य प्रसादतः॥ ८॥
॥इति श्रीनारदपुराणे सङ्कष्टनाशनं नाम गणेशस्तोत्रं सम्पूर्णम्॥


॥श्री गणेशाय नमः॥
श्री प्रज्ञाविवर्धनाख्यं कार्तिकेय स्तोत्रंम्
स्कन्द उवाच।
योगिश्वरो महासेनः कार्तिकेयोऽग्निनन्दनः।
स्कन्दः कुमारः सेनानीः स्वामी शङ्करसम्भवः॥1॥
गाङ्गेयस्ताम्रचूडश्च ब्रह्मचारी शिखिध्वजः।
तारकारिरुमापुत्रः क्रौञ्चारिश्च षडाननः॥2॥
शब्दब्रह्म समुद्रश्च सिद्धः सारस्वतो गुहः।
सनत्कुमारो भगवान् भोगमोक्षफलप्रदः॥3॥
शरजन्मा गणाधीशपूर्वजो मुक्तिमार्गकृत्।
सर्वागमप्रणेता च वञ्छितार्थप्रदर्शनः॥4॥
अष्टाविंशतिनामानि मदियानीतियः पठेत्।
प्रत्यूषं श्रद्धया युक्तो मूको वाचस्पतिर्भवेत॥5॥
महामन्त्रमयानीति मम नामानुकीर्तनम्।
महाप्रज्ञामवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा॥6॥
॥ इति श्रीरुद्रयामले प्रज्ञाविवर्धनाख्यं श्रीमत्कार्तिकेयस्तोत्रं सम्पूर्णं॥
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